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विधा सोंनेट, शकुंतला

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निषाद  कन्या    सम  लौहावर्णी    देह    सुडौल   दिव्यांगनी राजपुत्री   सम    दर्पित  काया    ज्यों   मेघ  मंडित   तरंगनी । कठोर हृदया  धरा मध्य  इक करुण कुण्डिका ज्यों छुपी हुई गहन  श्यामल  विमल  नीर    तरौच्छादित   झील  ढकी  हुई । मुखचन्द्र पर  दृग पट्टिकाएं   हैं बन्द चाप  दीर्घ  संधान किये किसलय  शय्या सोये मधुप  ज्यों मकरन्द  मदिरा पान किये । अहा तरुणी की आरुणि आभा मोहित मोर मृग खग शतदल ज्यों देव प्रतिमा निरिख निरिख  आनन्द पाते सन्तन मन तल । वन  कुमारी  दुष्यत  ब्याहता    गन्धर्व  प्रेम   कण्ठ  हार  भी चुन  रही  पुष्प  कलिकाएं   किये  कुन्तल  सुमन  श्रृंगार  भी । प्रियतम शशि  रख  हृदय व्योम  दीप्त हुई शकुंतला विभावरी आ...

नअश्कों से भीख

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नअश्कों से भीख नअश्कों से भीख शोखियों से तिज़ारत नहीं मिलती दिल में ना हो जुर्रत तो मुहब्बत नहीं मिलती। आये थे इस शहर में, खाली वो सौदागर चले गए परदेश में हर दफा बेपनाह दौलत नहीं मिलती। जागना पड़ता है रातों को, दिन का चैन गंवाकर फकत सोने से किसी को शौहरत नहीं मिलती। चन्द कागज के टुकड़े एक पुरानी कलम तीखी सी खानाबदोश शायर की मलकियत नहीं मिलती। बात मुख़्तसर इतनी दरमियां इस नफरत के मेरी सूरत नहीं मिलती, तेरी सीरत नहीं मिलती। जोड़ जोड़ रिश्ते खुद ही टूट गया 'विनोदी' कहीं नियत नहीं मिलती कहीं आदत नहीं मिलती। :- ⇨  रमेश विनोदी